Sunday, January 30, 2011

जीवन के हर रंगो से वाकिफ लेकिन सादगी से स्नेह ....

नमस्कार मित्रो ...
आज हमको एक अपने क्लास में साथ पढने वाली लडकी के बारे में लिखने को कहा गया है....उसका नाम नेहा है...
कुछ भी लिखने से पहले मै आपको ये बताना जरूरी समझता हु की इस दुनिया में दो तरह के लोग होते है...एक वो जो एक ही जीवन में सबको जान लेते है या जानने का प्रयास करते है..और दुसरे वो जो पुरे जीवन में एक लोग को ही जानने में व्यस्त रहते है...ये बात अलग है की कुछ लोग जो दुसरे तरह के व्यक्तियों की श्रिंखला की संख्या बढ़ाते है उनमे से कुछ उस एक व्यक्ति को को जानने में सफल होते है तो कुछ लोग असफल ...
मै सफल हुआ या असफल ये बताये बगैर मै आपको ये बता बना चाहता हु की मै उन दुसरे प्रकार के व्यक्तियों के समूह का हु....
मेरी बातो से आपको समझ में आ गया होगा की मै जिसके बारे में लिखने जा रहा हु उसके बारे में कुछ खास नही जनता....
वैसे एक बात और है किसी को जानना बहुत टेढ़ी खीर है ये इस लिए की व्यक्ति की प्रकृति एक ऐसी चीज है जो एक पल में भी समझी जा सकती है और नही तो सारी जिंदगी लगा दो फिर भी न समझ में आये...शायद इसी लिए मैंने लोगो को दो भागो में वर्गीकृत किया है ....
क्यों की किसी ने कहा है की...हर आदमी के होते है दस बीस चेहरे ,जिसे देखो बार बार देखो...क्यों की कोई जरूरी नही की अगर किसी लडके पाकेट से माचिस बरामद हो गयी तो हो वो लड़का सिगरेट ही पीता हो..ये बात अलग है की आज कल ऐसे लोगो की तादात में इजाफा हुआ है...
खैर छोडिये इन सब बातो को अब सब्जेक्ट पर आते है...
जैसा की मै आपको पहले बता चूका हु की मै उसके बारे में ज्यादा नही जनता सो मै जो भी लिखूंगा वो बाज़ार जोखिमो के अधीन होगा.
अब चलिए सब्जेक्ट की बात शुरु करते है....

किसी के बारे में लिखना बहुत ही मुश्किल काम है, समझ नही आता के क्या लिखें और क्या नहीं I आज जब कहा गया के लिखना है तो बड़ी कठिन समस्या उत्पन्न हो गयी...लिखें तो लिखें क्या, पर लिखना तो है ही I चलिए फ़िर लिख ही डालें कुछ I हमारे साथ पड़ती है एक लडकी, जिसका नाम है नेहा रंजन...सावला रंग, काली आँखें I क्लास में सबसे अलग...सादगी से भरा रूप , बस अपने काम से मतलब रखती है बाकी दुनिया जहाँ से कोई मतलब नही I अपने ख़ास दोस्तों के साथ रहना बहुत पसंद है उसे...पर क्लास में सभी को बहुत अच्छी लगती है और स्वभाव से भी काफी शांत है I

सभी से अच्चा व्यवहार है उसका, और कोई भी ऐसा नही जो उसके लिए कुछ बुरा बोले I एक मुस्कराहट हमेशा उसके चेहरे पर झलकती रहती है , वो ना ही सिर्फ शांत स्वभाव की है बल्कि दिल की भी उतनी ही साफ़ है...आज हर तरफ हमरं बस स्वार्थी लोग ही नज़र आते हैं वही उसके भोलेपन और सचाई को देखकर थोडा अजीब सा लगता है I हर तरफ आधुनिकता का एक दौर स्व चल चूका है जहाँ दुसरो को खुद से छोटा समझना और अजीबो- गरीब फ़ैशिओनब्ले कपड़े पहना आज की जरूरत बन चुकी है पर इसको देखकर ऐसा लगता है जैसे आज भी सादगी मायने रखती है I ना बोलने चलने में कोई लाग लपट ना ही पहनने ओढने में, ऐसा लगता है मानो सादा जीवन उच्च विचार का अनुसरण कर रही हो I

ज़िन्दगी को अपनी शर्तों पर जीने के बहुत ज्यादा हिम्मत की जरूरत होती है, और ये हिम्मत उसमे नज़र आती है I दुनिया के बनावटी कायदे-कानून से बच कर रह पाना थोडा मुश्किल हो जाता है पर अगर कोई ऐसा ऐसा मिल जाये तो ख़ुशी होती है I एक तरफ जहाँ हम आधुनिकता के नाम पर कोई भी चीज़ बिना सोचे समझे अपना लेते हैं, ऐसे लोगों के लिए ये एक सटीक उदाहरण है I किसी भी बात को आधुनिकता के नाम पर गले लगा लें कोई शान की बात नही, जिसका पता हमें तब चलता है जब बहुत देर हो चुकी होती है I भारतीय मूल्यों के साथ रहकर भी खुद को मोडर्न बनाया जा सकता है, सिर्फ कह देने भर से के हम भी भारतीय मूल्यों को समझते हैं , खुद में काफ़ी नही होता I

जबतक खुद में ये बात ना सनझ ली जाये के ज़िन्दगी सिर्फ फैशन तक ही सिमित नही तो बेहतर होता है, ज़िन्दगी का क्या भरोसा जाने कब खत्म हो जाये I हमें नेहा की जो बात सबसे अच्छी लगती है वो है उसका कम और सटीक बोलना मानो उसने एक बात गांठ बांध ली हो, वो बात है:

"अति का भला ना बोलना, अति की भली ना चुप"

जब वो किसी भी बात को बड़े ही सरल शब्दों में कहती है तो सामने वाले को उसकी बात समझ भी आती है सुनने में अच्छी लगती है, पर उसके साथ एक समस्या है...खुद में थोड़ी उलझी रहती है इन जाने किस बात से घबराती है! खैर इतनी सारी बातें जो हमने कही उससे बस एक बात बताना चाहते थे, आज आधुनिकता के नाम पर हम अपने जीवन मूल्यों से जो खिलवाड़ कर रहे हैं हमें उनका मोल समझना होगा होगा ये बाते मै अपनी तरफ से नही कह रहा हु बल्कि यह उसके जीवन शैली का सारांश है और जहाँ तक बात है आगे बढने की तो ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जी जाती है...किसी और के नही उसकी हर बात हमको यही सीखती है

तो क्यों न हम उसके जीवन शैली से सिख लेते हुए खुद को खुद्दार और आत्मनिर्भर बनाये....

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Friday, January 28, 2011

जाने कहाँ गये वो दिन.....?

माफ़ कीजियेगा ये पोस्ट जरा देर से सम्पादित कर रहा हु....
आज कल हम एक दुसरे को नव वर्ष की शुभ कामना देने में लगे हुए है. लेकिन जरा आज मेरे कहने से आप अपने बचपने में जा कर एक बार उस वक़्त के नव वर्ष अवसर को याद कीजिये. और पता लगाईये की हम आज जब सुचना और संचार के अब तक से सबसे विकसित पीढ़ी में जी रहे है. जब हमारे पास संचार के अनगिनत साधन उपलब्ध है. तब भी हम एक दुसरे से कितने दूर और कितने पास है?
कोई बात नही अगर मेरा अनुभव आप से मेल नही करता तो.
लेकिन जब मै अपने बचपन में गया तो मुझे कुछ ऐसा पता चला...
पहले जब हम लोग छोटे थे तब हम लोगो ये नही पता था की नव वर्ष रात के १२ बजे से ही शुरु हो जाता है. तो इस जानकारी के आभाव में हम लोग नव वर्ष प्रात: काल से ही मनाते थे.उस वक़्त हम लोगो के पास छोटे छोटे ग्रीटिंग्स कार्ड होते थे. उस पर छोटी छोटी कविताये लिखी होती थी... जैसे- टमाटर के रस को जुश कहते है और ग्रीटिंग्स न देने वाले को क्न्जुश कहते है.
एक बात और थी की उस वक़्त भी हम लोगो में प्रतिस्पर्धा रहती की हमे औरो की तुलना में कितने ज्यादा ग्रीटिंग्स मिली है,मैंने किसको दी और किसने मुझको नही दी.
हम लोग शुबह से ही एक दुसरे के घर जाना शुरू कर देते थे.हाला की मै लेट हो जाता था क्यों की रास्ते में सायकिल की चेन उतर जाती थी.उसको खुद से बनाना भी पड़ता था.उस वक़्त और लेट होता था जब पीछे वाला चेन उतर जाता था.
अगर किसी को ग्रीटिंग्स नही मिली और वो अपने ग्रीटिंग्स के बारे में कुछ पूछ लिया तो तो उससे हमे झूट भी बोलना पड़ता था की "दोस्त तुम्हारी वाली मै घर पर ही भूल आया हु." कल ले लेना.
इस तरह हम लोग पुरे दिन नव वर्ष मानते थे.
अब चलिए बात आज की करते है.......
आज हम नव वर्ष की सारी बारीकियो को जानते है की नव वर्ष रात के १२ बजे से शुरु होता है.और उसे हम शिला की जवानी के साथ मानते भी है. आज हमारे पास एस.एम.एस है जिसे जरिये हम एक दुसरे को रात के १२ बजे ही बधाई दे सकते है.लेकिन उस संदेश में टमाटर के रस जैसे बाते नही बल्कि आने वाले साल से जुडी तमाम अच्छी बातो की कल्पना की जाती है.आज हमारे पास वक़्त नही की हम किसी के घर जा सके. आज हम किसी को अगर बधाई देना भूल गये तो और अगले ने अगर उसके बारे में पूछ लिया तो एक तकनीक वाला झूठ अक्सर बोला जाता है की मैंने मोबाइल बदल लिया है और सारे के सारे नम्बर इधर उधर हो गये है.जब की उस झूठ को सुनने वाला भी वह झूठ उससे पहले न जाने कितने लोगो से बोल चूका होता है.
अब जरा इन दोनों बातो का उपसंहार निकालते है की कल हमारे पास स्लैम्बूक था और आज फेसबुक है, कल हम लोगो के पास ग्रीटिंग्स थी और आज मोबाइल, ऑरकुट है.
कल लोगो का एक दुसरे के साथ मेल था और आज हर एक दुसरे के पास इ मेल है. कल हमारे पास लिखने को छोटी छोटी कविता थी और आज लिखने की अच्छे अच्छे विचार है. कल हमारे पास रस्ते में धोका देने वाली सायकिल थी आज हम लोगो के पास उससे अच्छे अच्छे साधन है. कल के हमारे झूठ में मासूमियत थी और आज के झूठ में एक औपचारिकता. कल हम लोग शुबह से नव वर्ष मानते ठेव और आज हम लोग पूरी रात मानते है लेकिन वो कल के जैसे अपनापन नही दीखता.
कल हम हम लोग शुबह उठ कर मंदिर जाते थे और आज रात में १२ बजे मदिरालय जाते है.कल हम लोग स्कुलो में देश भक्ति कविताये सुनते थे और आज हमारे बीच ,हमारे चैनलों पर शिला और मुन्नी दिखाई देती है.
कही न कही हम पहले से ज्यादा विचारवान ,विकसित और रंगीन हो गये है लेकिन हमारा कल का नव वर्ष मनाने का तरीका ही हमको बेमिसाल लगता है .
क्या वो कल एक बार फिर से वापस नही आ सकता ?
हम आज एक दुसरे के पास हो कर भी दूर क्यों है...?मुझे इसका उत्तर नही मिल पा रहा है....
मेरा मन तो मुझ से पूछ रहा है की जाने कहाँ गये वो दिन...?

मित्र को धन्यवाद..

दोस्त तुमको मेरा जन्मदिन याद है ये जान कर बहुत ख़ुशी हुई....
तुमने अपना कीमती वक़्त का कुछ हिस्सा इस खत के माध्यम से हमको समर्पित किया इसके लिए धन्यवाद....
तुमने मुझे जीवन की महत्ता का अहसास कराया है....
और मै ये जनता हु की जब तक तुम जैसे दोस्त मेरे साथ रहोगे मै अपने मार्ग से नही भटक सकता ....
लेकिन मित्र ये सोच कर कभी कभी दुखी भी होता हु की मैंने किसी एक को ध्यान देने के चक्कर में ये भूल गया की तुम जैसे किनते लोग मुझे ध्यान देते है...
जिनको केवल मेरी खुशी,मेरी हसी से मतलब था....
तुम लोगो ने मेरा तब साथ दिया जब मेरा साथ उसने छोड़ दिया था जिसने हर वक़्त यही कसम खायी थी की वो मेरा साथ कभी नही छोड़ेगा...
लेकिन मै हर वक़्त उसी कसम तोड़ने वाले को लेकर दुखी रहता था जब की मुझे तुम जैसे लोगो पर खुश होना चाहिए था की तुम लोगो ने बिना किसी वादे के मेरे साथ बने रहे ....
मै यही सोचता हु की मेरा दिल तो किसी एक ने दुखाया पर मैंने अपने स्वार्थ में बह कर न जाने कितने लोगो का दिल दुखाया ......
पता नही उस वक़्त मेरे साथ गलत हुआ की सही ? लेकिन इतना जरुर पता है की किसी एक लोग के द्वारा धक्का देने के बाद इतने सारे लोग मुझे सम्हालने के लिए आगे आये....और वो तुम जैसे लोग मेरे सबसे प्रिय लोग बन गये हो....
जब भी मै उन पुरानी बातो को सोचता हु तो लगता है की जो होता है वो अच्छे के लिए ही होता है .......
तुमने मुझे हमेशा यही बताया है की कैसे दो सही रास्तो में से बेहतर चुनते है ? और कैसे दो गलत रास्तो में से मुनासिब ?
मै तुम्हारे द्वारा बताये गये सुझाव पर अमल करूंगा ......
इसी के साथ मै अपनी बात खत्म करता हु......
और मै इश्वर से यही कामना करता हु की तुम सदैव सफलता को प्राप्त करते रहो...

Thursday, December 23, 2010

समर पड़ से ले कर खुदगर्जी तक का सफर

नमस्कार मित्रो...
देखते देखते साल २०१० का सफर खत्म होने को है...
तो आज हम लोग इस लम्बे मगर छोटे प्रतीत होने वाले सफर के एक छोटे से भाग पर चर्चा करते है...
वो है समरपड़ से ले कर खुदगर्जी तक का सफर ...
आप सोच रहे होगे न की हमने इस साल इन् स्टेशनों के बीच सफर कब तय किया...?
तो मै याद दिलाता हु ये सफर छोटा तो है मगर ताज़ा भी है...
इस सफर को समझते है...
फ़िल्मी तरीके से....अभी अभी कुछ दिन पहले एक सगीत हम लोगो के बीच बहुत लोकप्रियता से सुनाई और दिखाई पड़ रहा था जो की एक समरपड़ भावना को दर्शा रहा था॥
वो गीत था मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए...
मतलब की इसमें मुन्नी का बदनाम होना अपने प्रिये के प्रति समर पड़ को दर्शाता है...
ठीक इसी तरह कामन वेल्थ गेम्स में हमारे देश के खिलाडी तो खूब मेहनत किये लेकिन खिलाडियों के खिलाडी सुरेश कलमाड़ी ने एषा खेल खेला की देश खिलाडियों के खेल की वाहवाही केवल एक दिन की खबर के अलावा कुछ नही बन पाई...ये था हमारे देश के खिलाडियों का समर पड़ जो की कलमाड़ी साहब के कारण धूमिल हो गया...
अभी मै हम इस समर पड़ से भरे कर्णप्रिय और नैन सुख से भरे संगीत को पूरी तरह आत्मसात भी नही कर पाया था की समर पड़ के विपरीत और खुदगर्जी के भावना से लबालब एक गाना मार्केट में आ गया ...किसी और की मुझको जरूरत क्या मै खुद से प्यार जताऊ(शिला की जवानी) ने मार्केट में खुदगर्जी की गर्म हवा चला दी...
जब समर पड़ में सुरेश कलमाड़ी साहब जिम्मेदार हो सकते है तो खुदगर्जी में आम आदमी हाथ कैसे हो सकता है...?
इसमें हम लोग बात करेगे ऐ राजा की जो इतने खुदगर्ज है की इनकी खुदगर्जी देख कर शिला भी सरमा जाये॥
राजा साहब ने इतनी सावधानी से अब तक का सबसे बड़ा घोटाला कर डाला और वो भी अकेले अकेले।
कलमाड़ी के करामात और राजा की अपने मनत्रालय में राजशाही ने मनमोहन सरकार जो की खुद को मनमोहक सरकार मानती थी को इन् दोनों स्टेशनों के बीच दो स्टेशनों के बीच के सफर के दौरान बहुत परेशानी हुई..और साथ ही साथ बिहार की हार जो की राहुल गाँधी के गले में पड़ा हुआ है ने भी सरकार के घाव में नमक का काम किया है॥
खैर आपको ये सफर कैसा लगा ? ये जरुर बतायेगा ...
नये साल में हम आशा करते है है मुन्नी की बदनामी और शिला की जवानी केवल लोगो का मनोरंजन ही करेगी॥
इन् गानों का मतलब किसी घोटाले को सम्बोधित नही करेगा...
इस्सी के साथ मै आप सबको नये साल की शुभ कामना देने के साथ ही विदा लेता हु॥
नमस्कार ॥

Saturday, October 30, 2010

हाय रे होठ लाली...................................

नमस्कार मित्रो ....
आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाये....
आज हम लोग बात करेंगे धमाके की.....एक ऐसे धमाके की जो की इकोफ्रेंडली धमाके जैसा लगता है....
लेकिन आपको भारत वर्ष के बारे में पता तो होगा ही....यहा होता कुछ है होते होते कुछ और ही हो जाता है...
यहाँ कोई जूता घिस घिस कर उतना नही कमा पता पता जितना की एक लड़का किसी गड्ढे में गिर कर कमा लेता है....(प्रिंस)
यहा के लोगो को यहा की समस्या नही दिखती और बाहरी कोई यहा की समस्या पर छोटी सी फिल्म बना कर ओस्कार जित जाता है....(स्माइल पिंकी )
खैर छोडिये यहा ऐसे धमाके होते रहते है.....
इस बार जो धमाका हुआ है वो भी सृंगार से निकला हुआ है....
वो है एक यूवती के सोलहो सृंगार में से एक होठ लाली....
हुआ ये की...आई आई टी रुडुकी में कुछ दिन पूर्व वहा के लडको ने अपनी सह:पाठी महिला मित्रो को अपने मुह में लिपस्टिक दबा कर उनके होठो को लाल किया.....और साथ ही साथ अपनी संस्कृति को कालिख भी पोत दी....
हमे एक तरफा विरोध करने से पहले ये सोचना चाहिए की ये वो लोग है जिनकी इस हरकत को बचकाना कहना और भी बचकाना होगा...क्यों की ये लोग हमारे देश के भावी ईन्जीनियर है....
इन लोगो ने ऐसा करने से पहले क्या सोचा होगा ?
ये तो यही लोग बता सकते है....लेकिन एक बात जो हमारी समझ में आती है वो है की विदेशियों की नकल...
वो ही लोग ऐसा काम करते रहते है....
मै अपने ब्लॉग के माध्यम से उनको ये बताना चाहता हु की हम लोग जिनकी नकल आंख बंद कर के कर है....वो लोग कल भी ऐसे ही थे और कल भी ऐसे ही रहेंगे....
लेकिन कल हमारा देश सोने की चिड़िया और विश्व का गुरु था....,लेकिन आज क्या है...
आज हम जो भी है अपने इस नकल करने के स्वभाव के कारण ही है...॥
जो कुछ भी .आई आई टी रुडुकी में कुछ दिन पूर्व हुआ वो हमारे शैछिक वातावरण को दूषित करने के लिए पर्याप्त है...
आज हम विदेशियों की नकल और इंटरटेनमेंट के लिए लिपस्टिक लगा रहे है और कल मंगलसूत्र पहनायेंगे और सिंदूर भी लगा देंगे....
जब हम इस बारे में और लोगो से बात किये जिसमे सभी वर्ग के लोग थे तो कुछ युवा ऐसे मिले जो की इस घटनाक्रम को एक दम से सही करार दिया और कहा की अब हमको इतनी छुट तो मिलनी ही चाहिए...
तो इससे एक बात साफ है की जब तक हमारे आधुनिकता ,समाजिकता और नैतिकता में उचित ताल मेल नही होगा तब तक हम सही मायने में विकसित नही हो पाएंगे...
इस के लिए आब वक़्त आ गया है क्यों की.....
अब ऐसे मंजर सामने आने लगे है...
लोग गाते गाते चिल्लाने लगे है....
शिछा का पानी बदल दो यारों...
क्यों की इस्सके पुष्प दल मुरझाने लगे है....
आपकी प्रतिपुष्टि का इंतजार है हमको.....

Tuesday, October 26, 2010

ये सडक दो ज्योतिषियों की दुकान से हो कर जाती है....

मित्रो को नमस्कार और बडो को प्रणाम....
कल मै जब अपने हॉस्टल से निकला तो मेरी मंजिल थी...भारतीय जनता पार्टी का कार्यालय....मुझे रास्ता ठीक ठीक नही पता था ..मै जब निशातगंज पहुचा तो एक सज्जन से कार्यालय का पता पूछा उन्होंने बताया की आप एकदम सीधे चले जाईये...जहा पर आपको ज्योतिषियों की दुकान मिलेगी..वही आपका कार्यालय है....
मै वह पहुचा और काम निपटा कर बाहर आया तो हमको लगा की उस सज्जन व्यक्ति ने हमको पूरा पता नही बताया...क्यों की यहाँ सडक के दोनों तरफ ज्योतिषियों की दुकाने है...
एक तरफ जो की सडक के किनारे अपनी दुकान लगाये है...और दूसरी तरफ विधानभवन जिसमे हमारे राज्य के निर्वाचित ज्योतिषी रोजाना दुकान lgate है....
अब जरा दोनों ज्योतिषियों का तुलनात्मक अध्यन करते है ....
सडक के इस पर वाला ज्योतिषी जो की लोगो का हाथ देखे है और सलाह देते है की...आप ये करेंगे तो आपकी तमाम समस्यां खत्म हो जाएगी....
समस्यां मतलब...बच्चे का दाखिला , बेटी की शादी,बेटे की सरकारी नौकरी ,आर्थिक परेशानी कब खत्म होगी? इत्यादि....
हम aam जनता उनकी बातो का भरोषा भी करते है....
हमे लगता है की ये वाला ज्योतिषी सही कह रहा है....
अब बात करते है है सडक के उस पार वाली दुकान की जिसमे हमारे द्वारा भेजे गये ज्योतिषी आपनी दुकान lgate है....
इसमें दुकान लगाने वाले को विधायक कहते है...
जो की हमारे राज्य का भविष्य का निर्धारित करते है....और उसी राज्य में हम aam लोग भी रहते है...जिनकी समस्या हम पहले बता चुके है...
मजेदार बात ये है की जो समस्या हम लोग सडक के इस पार वाले ज्योतिष से बताते है...वो समस्या सड़क के उस पार वाले ज्योतिषियों के समूह द्वारा पैदा की गयी होती है...
मतलब की बेरोजगारी , महगाई, बीमारी,इत्यादि।
क्यों की इनके गलत काम से हम aam लोग परेसान होते है...
और फिर शांति के लिए सडक के इस पार वाले ज्योतिषियों के पास आते है...
सो हमको अपना ज्योतिषी खुद ही चुनना होगा...जो हमारा हमारे भविष्य को सुरछित कर सके...
इस्सके लिए हमको अपने लोकतान्त्रिक पर्व में मतदान करना होगा...
जो की हमारे हिसाब से सही होगा...
अब मित्रो आप को तो दोनों ज्योतिषियों के बारे में पता चल गया....न॥?
अब मै ये आप को ये छुट देता हु की आप कौन सा ज्योतिषी पसंद करेंगे...
इस पार वाला या उस पार वाला...?
हाला की ये सडक दो ज्योतिषियों की दुकान से होकर जाती है...

Saturday, October 23, 2010

क्या से क्या हो गया लखनऊ...?

नमस्कार मित्रो...
मै अपनी अनुपस्तिथि की बिना कोई वजह बताते हुए.....आप लोगो से माफ़ी मांगता हूँ !
आज हम लोग बात करेंगे..नवाबो और तहजीब के शहर लखनऊ की....और ये जानने की कोशिश करेंगे की "ये कहाँ आ गये हम यु ही साथ चलते चलते ....."
जी हां .....जैसे जैसे वक़्त का पहिया घूमता रहा...वैसे वैसे कल का अवध आज का लखनऊ बन कर सामने खड़ा है....
जहाँ कल इक्के के घोड़े के खुर की ट्प ट्प की आवाज गुजती थी...वही आज फ्र्राटे भरती गाड़ियाँ पीछे से निकल जाती है और आवाज तक नही होती...
लेकिन शोर पहले से भी ज्यादा है...
आखिर इस शोर की वजह क्या है...?
सुनने में तो ये विरोधाभाषी पंक्तियाँ लगती है..लेकिन वक़्त के साथ साथ इस विरोधाभाष की स्वीकारना ही पड़ेगा...
पहले के अवध में केवल लोग रहते थे...न ही एक दुसरे में पतंग के धागे जैसी उलझी सड़के थी...और न ही आकाश को भेदने वाली इमारते॥
थी तो सिर्फ अदब,सादगी,और शांति। था तो सिर्फ सुकून ...जो की आज किसी किसी के पास नही है॥
आज बगल में क्या हो रहा है...किसी को पता नही...लेकिन बिग बॉस में क्या हो रहा है...वो मेसेज के इन्बोक्स में लिखा होता है....
है न विरोधाभास ...
कहते है की आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है....लेकिन यहाँ सब कुछ उल्टा है...
अवध के पास इमारते नही थी...लीकिन वो सबको घर देता था....
आज लखनऊ के पास इमारते है...लेकिन लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजरते है...
अवध के पास अस्पताल नही था ...लेकिन वो सबको निरोग रखता था...
लखनऊ के पास अस्पताल है..फिर भी ऐसी ऐसी बीमारिया सामने आ रही है की पता लगाना भी मुस्किल हो गया है...
अवध के लोग शांति के लिए पूजा करने के लिए अगरबत्ती जलाते थे...
और लखनऊ के लोगो के बच्चे पटाखे जलाने के लिए अगरबती जलाते है...
है न विरोधाभाष ....
हम ये कह सकते है...की हम लोग एक कुश्ती के मैच के रेफरी है...और हमारे सामने..दो लोग लड़ रहे है।
एक नैतिकता और दूसरी आधुनिकता ...हमने अपनी नैतिकता को हर दिया है....
खैर जो भी हो....
हमे खुद को सम्हाला होगा...
आपका का सुझाव के इंतजार में मै अपनी बात यही खत्म करता हु...
नमस्कार...