Friday, May 18, 2012

स्त्री को खुद समझना होगा की वो स्त्री है.....

नमस्कार मित्रो....
मेरे ब्लॉग पर आप सबका स्वागत है, बहुत दिनों बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूँ अत: आप से निवेदन है की हमको लापरवाह ही समझिएगा कोई नेता नही जो सिर्फ काम की वजह से ही हम लोगो के बीच में आते है...
वैसे तो मेरा कोई लिखने का मन नही था लेकिन कुछ दिन से ऐसा कुछ घट रहा है जिसको बिना लिखे मन ही नही मान रहा...
हुआ यूँ की अभी कुछ दिन पहले मैंने एक किताब पढ़ी "खुदा की वापसी"..उसमे स्त्रियों  के बारे में लिखा था जिसमे उनकी दशा और दुर्दशा के बारे में बताया गया था लेकिन उस किताब में जितनी स्त्रियों  का जिक्र किया गया था उन सब में पुरुष का हाथ तो था ही साथ ही साथ दूसरी स्त्रियों का भी बराबर का हाथ था...
अगर पुरुष का हाथ एक पति के तौर पर था तो वही स्त्री का हाथ कभी सास  , बुआ , ननद , भाभी के तौर पर था मेरे कहने का मतलब ये है की एक स्त्री जो की एक पत्नी है उसकी दुर्दशा के पीछे सास  , बुआ , ननद , भाभी के जैसे चार स्त्रियों का हाथ होता है और जब हम की सामाजिक मंच पर पहुचते है तो सारा का सारा ठीकरा मर्द पर ही फोड़ डालते है,ऐसा बिलकुल नही है की मै मर्द की तरफदारी कर रहा हूँ क्यों की जब भी कोई भी जायज रिश्ता टूटता है तब इंसान की भावनाये मर जाती है और भावना को कभी स्त्री और पुरुष में नही बाटा जा सकता, ये सबके साथ एक जैसी होती है
आज महिला को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तमाम संगठन कार्य कर रहे है...
अख़बार , टी. वी . चैनल , पत्रिका सब के सब महिलाओ की दशा सुधारना चाहते है लेकिन पता नही ऐसी कौन सी दुर्दशा है जो की राजा राम मोहन राय के समय से  कर आज तक दूर नही हो पाई
रोज नये नये वाद विवाद महिला आयोग द्वारा हम लोग टी. वी .पर देख सकते है की हम स्त्रियों को आत्म निर्भर बनाना चाहते है, हम बेटी बचाना चाहते है , तो हम घरेलू हिंसा खत्म करना चाहते है लेकिन ये सब लोग ये बाते सिर्फ अख़बार , टी. वी . चैनल पर ही करते है...
अभी कुछ दिन पहले ही जसवान्ति नरवार नाम की महिला जिसको महिला शक्ति का पुरस्कार मिल चूका है ,को आश्रम में रह रही लडकियों से जबरदस्ती देह धंधा कराने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया , यहाँ भी महिला की दुर्दशा के पीछे एक महिला का हाथ ही उजागर हुआ..
स्त्री  की दुर्दशा तभी तक है जब स्त्री खुद को कमजोर समझेगी क्यों की ओशो ने कहा है की "जिस मुल्क में माँ खुद को दीन समझे उस मुल्क में उसके बेटे कभी बड़ा नही बन सकते " और वो माँ ही है जो एक बेटा या बेटी पैदा करती है और वही बेटा और बेटी बाद में पति , पत्नी , ननद ,भाभी ,बुआ बनती है
महिलाओ से जुडी कितनी भी किताब पढो चाहे उसको पुरुष लेखक ने लिखा हो या फिर महिला लेखिका ने उसमे एक बात अवश्य लिखी होती है की ये समाज स्त्री को एक सामान समझता है एक विक्रय की वस्तू समझा जाता है और ये बाते हमको अपने दिल से निकालनी होगी...
ये बात दिल से कैसे निकल सकती है जब हर काम में स्त्रियों का ऐसा ही प्रयोग किया जा रहा है , आप आज ही या अभी अपना टी वी चालू कीजिये अधिकतर विज्ञापनों में आपको यही दिखाया जायेगा की आप फलां ड्रिंक पियो तो लड़की आप से बात करेगी, फलां डियो लगाओ तो लडकिय खिची चली आएगी, फलां टूथपेस्ट करोगे तो लड़की आपसे बात करेगी, फलां सिम कार्ड यूज करोगे तो एक नही दो लड़कियां आप से से बात करेंगी..
क्या इन तमाम उत्पादों का विज्ञापन उसके सकारात्मक उपयोगिता के अधार पर नही किया जा सकता था ?
बेशक किया जा सकता था लेकिन इस प्रकार के विज्ञापन मात्र विज्ञापन नही बल्कि हमारे चरित्र प्रमाण पत्र भी मालूम पड़ते है लेकिन ऐसा बिलकुल नही है कोई भी लड़का या पुरुष ये सोच कर कोई उत्पाद नही खरीदता की उसके साथ ऐसा ही होगा जैसा की विज्ञापन में दिखाया गया है..
तो जब हम ऐसे नही है तब हमको ऐसा क्यों समझा जाता है और इस मामले में वो महिला आयोग कहा गया , उसको सामने आकर कहना चाहिए की स्त्री की एक खुद की मर्यादा है जो की उत्पादों की वजह या खासियत से नही टूट सकती...
मेरे इस तमाम बातो को कहने का मतलब यही था की स्त्री क्या है ये कभी स्त्री को बताया ही नही गया हमेशा ये बताया गया की उसको समझा क्या जाता है और जो उसको समझा ही नही जाता...
इसलिए स्त्री को खुद समझना होगा की वो स्त्री न की कोई सामान या न ही कोई बिकाऊ वस्तु अगर स्त्री ने ऐसा नही सोचा तो चाहे कितने भी आन्दोलन हो जाये ,चाहे कितने भी आयोग बन जाये , चाहे कितनी भी किताब छप जाये ,स्त्री की दशा पर कोई प्रभाव नही पड़ने वाला....




Friday, August 12, 2011

उपहार को अधिकार मानना गलती है..............?

आरक्षण फिल्म पर बहस पुरे देश में जारी है की आरक्षण सही है या गलत ?
आखिर जरूरत क्यों हुई आरक्षण की? क्या जिस उद्देश्य को ले कर आरक्षण लाया गया था वो पूरा हो पाया...?
अगर बात केवल फिल्मो की करे तो इस तरह हो हल्ला मचाना बहुत ही हास्यास्पद लगता है . जिस प्रकार दलितों तथाकथित मसीहा या प्रतिनिधि पि.डी कैमरा और संगन की सुनहरी और दुधिया लाइट में दलितों की बात करते है तथा अपने अपने बयानों की वजह से दलितों और पिछडो को खुद अपने ही मुह से ये याद दिलाते है की इस समाज उनकी क्या औकात है...?
अभी एक समाचार चैनल में पी. एल. पुनिया ने इस फिल्म का एक संवाद बताया की जिसमे कहा गया है की दलितों के कपड़ो से बदबू आती है और वो बहुत गंदे होते है इस्सलिये सवर्णों के लडके उनके साथ नही पढाई करेंगे...
मतलब की फिल्म से पहले ही उन्होने द्तिलो की स्थिति अपने मुह से बता दि. लेकिन यह नही सोचा की जो दशा फिल्म में दर्शायी जा रही है वो सही है या गलत...?
अगर गलत है तो निश्चय ही उस दृश्य को हटा देना चाहिए. लेकिन अगर सही है तो वो खुद अनुसूचित जाति जनजाति के अध्यक्ष है तो दलितों की यह स्थिति कब सुधरेगी?
रही बात आरक्षण की तो हमारी सरकार ने दलितों के लिए केवल दो चीजे ही आरक्षित की है...
१ - एक रेडियम का बना हुआ बोर्ड जो की रात में भी साफ साफ पढ़ा जा सके जिस पर की लिखा होता दलित बस्ती ...क्यों की दलित बस्ती में बिजली तो आती ही नही ...
२ - और एक सरकारी शराब देशी शराब की दुकान जिससे की वो दलित जिनता मजदूरी कर के कमाते है उतना शाम को थकन मिटने के नाम पर जमा कर आते है...
लेकिन किसी सरकार ने दलितों के लिए एक अच्छा स्कूल, अच्छा अस्पताल आरक्षित नही किया....
लेकिन जब दलित समाज और पिछड़ा समाज प्रथमिक रूप से ही शिक्षित और स्वस्थ्य नही रहेगा तो फिर उसको आप उच्चतर शिक्षाओ में २७ % तो क्या १००% भी आरक्षण दे दे तो भी कोई प्रभाव नही पड़ता..
नेताओ ने मांग की इस फिल्मो की कुछ दृश्यों को को कट दिया जाये और तब फिल्म दिखाई जाये....
मतलब की आज तक हम रियल्टी शो के नाम पर किसी को ट्यूब लाइट तोड़ते देखते आये तो किसी नेता नही कुछ नही किया लेकिन जब आज किसी ने सच मुच में जब रियलटी दिखने की कोशिस की तो इनको तकलीफ होने लगी....
आखिर इस तकलीफ की क्या वजह है?
जहा तक आरक्षण की बात है तो आज भारत में केवल जातिगत आरक्षण ही नही है...
आरक्षण के और भी रूप है...जैसे की. एन सी सी , स्पोर्ट, केन्द्रीय मंत्रीका कोटा, स्वत्न्र्ता सेनानी , भूत पूर्व सैनिक और हर संस्थान के कर्मचारी का एक अलग कोटा होता है..
तो अगर विकलांग कोटे को छोड़ कर देखा जाये तो बाकि सब कोटे ऐसे लगते है की एक उपहार के तौर पर दिए गये है ...
और फिल्म में भी आरक्षण को कैस्रत ही कहा गया है...जो की अभी एक था कथी अगड़े समाज द्वारा कहा जाता है ...तो जब इस उपहार को दलितों ने अपना अधिकार समझ लिया तो क्या बुरा किया?
आखिर समाज की रचना करते वक़्त या फिर समाज को ब्राम्हण , क्षत्रिय ,वैश्य और शुद्र में बाटते वक़्त किसने उनको अधिकार दिया ने निर्धारित करने का की फलां ये कम करेगे और फलां ये काम....
हमारे ही समाज बुद्धजीवियो द्वारा यह खिची हुई लाइन है...
रही बात दुसरे पक्ष यह भी नही नकारा जा सकता की दोनों तरफ से कुछ अपात्र लोग भी सुविधा के पात्र हो जा रहे है और पात्र लोग नही....
लेकिन जिस स्थिति की कल्पना कर के आरक्षण का प्रावधान किया गया था वो आज भी साकार नही हुआ है...सिर्फ और सिर्फ हमारी सरकारों के कारण
देश के जितने भी दलित आगे है वो या तो नेता है या नेता के रिश्तेदार . बाकि दलितों को न तो शिक्षा मिली न रोजगार....
मिलातो सिर्फ एक सस्ते गल्ले की सरकारी दुकान जिसका ठेका भी नेताओ के चाटुकारों को मिलता है...
और मिला तो भारत सेकर की तरफ से उनके बच्चो को मिड -डे- मिल में घटिया खिचड़ी ..
और जब चुनाव आया तो उस दलित बस्ती में पहुचा दिया पेटी का पेटी देशी शराब...
फिर ले लिया वोट और छोड़ दिया सबको उसकी में मरने क लिए कभी डेंगू से कभी मलेरिया....तो कभी बाढ़ से
दलितों को न तो शिक्षा दि गयी और न तो उनको समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास किया गया....
उनको हमेशा उस स्थान पर रखा गया है जिससे की उनका सही रूप से भावात्मक इस्तेमाल किया जा सके .....
मै अपने उत्तर प्रदेश का उदाहरण दूंगा आपको ...बहुजन समाज पार्टी जो की दलितों की बहुत मसीहा मानी जाती है लेकिन फीर भी उत्तर प्रदेश में दलित आगे क्यों नही है?
उसका कारण सिर्फ और सिर्फ यही है की मायावती ने दलितों को भावत्मक रूप से धोका दिया है...
महात्मा बुद्ध और अम्बेडकर जी जैसे म्हापुरुसो के नाम पर उन भोले भाले दलितों को धोका दिया है...
अगर मायावती जी दलितों की शुभचिंतक है तो क्यों आपने सवर्णों को तिक्त दिया और दलितों का वोट लिया....?
क्यों नही दलितों को ही टिकट दिया ...?
सो दलित .पिछड़ा ,आरक्षण पर बहस कभी भी एयर कंडीसन में नही हो सकती जरूरी है की हमको इसके लिए सतही तौर पर विचारना होगा....
और फिल्मो पर रोक लगाना और ये निशी करना की जनता को क्या दिखाना है और क्या नही यह बहुत ही निंदनीय है.....
स्वंत्रतता भी हमको नही मिली होती अगर हमने पत्रकारिता का सहारा नही लिया होता....
आप सबको हमारी तरफ से स्वंत्रतता दिवस की हार्दिक शुभ कामनाये....


Wednesday, August 10, 2011

खुशियों की होम डिलेवरी...........

नमस्कार मित्रो......
आज का सब्जेक्ट आप सब लोगो के लिए है...
एक बात तो मै दावे के साथ सकता हु की आप लोग खुश नही होंगे ...खुश होने का मतलब की कोई न कोई परेशानी हम सबको है . लेकिन ऐसा क्यों है?
जब की हम लोगो के पास दुनिया की हर ख़ुशी पाने का एक रास्ता है jrur है....
लेकिन फिर भी हम खुश नही है...
इस निष्कर्ष पर पहुचने की बहुत दिलचस्प कहानी है ...
हुआ यू की मै अभी थोड़ी देर पहले टी . वी. देख रहा था और टी.वी. पर न्यूज देख रहा था तभी बीच में ब्रेक आ गया..
अब तो यही भी समझ में नही आता की न्यूज में ब्रेक आता है की ब्रेक में न्यूज....?
हमको लगता है की ब्रेक में ही न्यूज दिखाते है तभी तो ब्रेकिंग न्यूज कहते है......
हम मुद्दे पर आते है....
हम खुद की ख़ुशी की बात कर रहे थे न....
हमने जो विज्ञापन देखा उन सबको देख कर हमको ये लगा की अगर किसी के पास टी. वी है और टी. वी का रिमोट है तो सारी खुशिया उसके पास है ...
जरा सोचिये की किसी को खुश होने के लिए क्या चाहिए ?
उसको चाहिए की उसकी हर तरफ लोग झूमे, गाए, नाचे और हर तरफ धूम मची हो मस्ती की ...तो कितनी आसान है ये हमारी ख़ुशी...टाटा स्काई लगा डाला तो लाइफ जिनगा लाला ...
मतलब की जीवन का हर काम ख़ुशी खुशी होगा. लेकिन फिर भी आपको खुशियों की चाभी नही मिली तो निराश मत होईये इसका भी उपाय है हमारी टी.वी में...
टाटा नैनो खुशीयो की चाभी...उसके बावजूद भी अगर आप चाभी से संतुस्ट नही है दुनिया को jitne का मन है तो आप ऐसा भी कर सकते है...
घबराइए मत आपको इसके लिए कोई यौद्धा नही बनना होगा... बस एक काम...मुह में रजनी गंधा और कदमो में दुनिया ...
दुनिया कदमो में है में लेकिन फिर भी दिल को सुकून है इसका भी रास्ता है...रिलायंस अपनाईये...मतलब कर लो दुनिया मुट्ठी में ..
इसका मतलब की आप आजाद हो गये...अगर नही हुए तो कोई बात नही...रिलायंस छोडिये एयर टेल लाईये क्यों ऐसी आजादी और कहाँ...?
इतनी सारी खुशियों के बाद हमको नही लगता की कुछ छुट भी गया होगा....
अगर छुट गया होगा तो वो कसर हेयर एंड केयर से ले कर फेयर एंड लवली पूरा कर देंगे....
जीते जी अगर खुशियों से मन नही भरा तो आपके पास अभी और विकल्प भी है...
यह विकल्प तो आज कल dual सिम के मोबाइल से भी ज्यादा कारगर है....
वो है एल आई सी मतलब की जिन्दगी के साथ भी और जिन्दगी के बाद भी...

ये तो बात हुई निजी कंपनियों के विज्ञापन की अब तो ये निजी कंपनियों के विज्ञापन सरकारी विज्ञापन को भी ठेंगा दिखा रहे है...
मलतब की इनका कांफिडेंस इतना हो गया है की एक विज्ञापन ने तो परिवार नियोजन तक अपने उत्त्पाद से जोड़ दिया...
अभी हल ही में एक विज्ञापन आना शुरू हुआ की इंडिया की पापुलेशन कंट्रोल में रहेगी क्यों अब इण्डिया इस बीजी ऑन आईडिया थ्री जी...
हाला की अभिषेक बच्चन ने बताया की उसका बेबी बेफोरे थ्री जी है...
तभी तो उनके बेबी पर करोरो का सट्टा भी से लग चूका है...
है न मजेदार बात की जिसको ढूंढा गली गली वो तो हमारे टी.वी में मिली....
यह सब सोच कर मै खुश हो ही रहा था की एक विज्ञापन आया और मै कल्पना के उडान बरने के बाद बहुत तेजी से वास्तविकता की धरातल पर लैंड कर गया ...
वो विज्ञापन था एक cream की कम्पनी का....
नाम था गार्नियर... उस विज्ञापन के अंत में एक हिरोइन ने बहुत मासूमियत से kha की अपना ख्याल रखना....
मतलब की हमको फ्री में ख़ुशी कोई नही दे सकता..
आम आदमी को खुद ही अपनी life को झिंगालाला बनाना पड़ता है....
चाहे उन सबने लक्स की बनियान ही क्यों न पहनी हो...क्यों लक्स कहता है की अपना लक पहन कर चलो ...
हमे सब कुछ खुद की करना होता है क्यों की खुशीयो की होम डिलेवरी कही नही होती ... बस डोमिनोस पिज्जा को छोड़ कर...

Sunday, August 7, 2011

फ्रेंडशिप डे के साइड इफ्फेक्ट ........

मेरे ब्लॉग पर एक बार फिर आपका स्वागत है....

और मेरा भी मेरे ब्लॉग पर स्वागत है.....

क्या है न की मै खुद एक लम्बे अन्तराल के बाद आज आपलोगों से मुखातिब हो रहा हूँ........

इसकी वजह कुछ खास तो नही बस यह मान लीजिये की माहौल कुछ अनुकूल हो गया ...

जिसने हमको लिखने को मजबूर कर दिया ...

पहली वजह यह है की आज रविवार है. जिससे की मेरे पास वक़्त है .औए दूसरी वजह की मेरे पास सब्जेक्ट है जिस पर की बिना कोई दबाव लिखा जा सकता है...

आज जब मै सुबह जगा तो देखा की मेरे मोबाईल पर रोज की तुलना में कुछ ज्यादा ही संदेश आये है.उनमे से कुछ ऐसे भी थे जिनके संदेश रोज ही आते थे और कुछ ऐसे भी जिनकी याद हमको भी आज ही आई जैसे की उनको हमारी याद संदेश भेजते वक़्त जब लोगो को एक साथ फोनबुक से मार्क किया होगा तब आई होगी.

वैसे उन्स्बके संदेश में एक समानता थी जो उनकी और हमारी मित्रता की और इशारा करती थी...

और मै ये जान चूका था की कितने लोगो को मेरी ख़ुशी में ही उनकी ख़ुशी दिखाई देती है....

ये सोचे बगैर की ये औपचारिकता का रायता कितना फ़ैल चूका है सुबह..सुबह ..

वैसे तो वो लोग जो हमको रोज संदेश भेजते थे रोज उनके संदेशो में फुल, गुलाब, कांटे,खुदा , जैसे शब्द होते थे जिनका अर्थ अंत में यही निकलता था की दुनिया की सारी ख़ुशी हमको ही मिल जाये भले ही वो लोग झुनझुना बजाते रहे ....

लेकिन आज उन लोगो ने भी हमको लोग सबकी तरह अंग्रेजी के संदेश किया था जिसमे वाकई कठिन शब्दों का प्रयोग हुआ था लेकिन सबके अंत में हैप्पी फ्रेंडशिप डे लिखा होने के कारण उन सभी संदेशो का सारगर्भित अर्थ समझ में आ गया ..

फिर मैंने सोचा की आज फ्रेंडशिप डे के बारे में ही जाने की कोशिश करते है...

फिर मैंने इसके बारे में इंटरनेट पर खोजना शुरू किया तो वहा भी अंग्रेजी में बहुत कुछ था लेकिन हमको जितना समझ में आया वो वो है की हर काम की तरह इस काम की शुरुवात में भी अमेरिका ने बाजी मारी

अर्थार्थ सर्वप्रथम यूनाइटेड स्टेट कांग्रेस ने १९३५ ये निश्चय किया की वो अगस्त के प्रथम रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाएगी .....हाला की यह भी कहा गया है की इसकी शुरुवात सर्वप्रथम जोएक हॉल ने की १९१९ में की जो हॉल मार्क मानक ग्रीटिंग कार्ड नामक कम्पनी के संस्थापक थे...

और भी चीजो का अनुवाद करने पर हमको पता चला की यह उस वक़्त की पाश्चात्य सभ्यता में लोगो का एक दुसरे पर असीम विश्वास औए एक दुसरे से प्रेम जताने के लिए भी इस दिवस को बनाया गया...

और उसके बारे में नीचे कुछ पवित्र बाइबिल की पंक्तिया भी लिखी थी...

मांगो तुम्हे मिल जायेगा ...

खोजो तुम्हे प्राप्त हो जायेगा....

खटखटआओ तुम्हारे लिए खोल दिया जायेगा....

ये था फ्रेंडशिप डे का मूल स्वरूप ...

अब बारी आती है हमारे देश की ..

चुकी हमारा देश नमक जैसा है जो किसी भी सभ्यता .रहन ,सहन जैसे द्रव में आसानी से घुल मिल जाता है ...

बात चाहे फ्रेंड शिप डे की हो या वेन्ल्तैन डे की.....

नतीजन भारत में भी यह मनाया जाने लगा....

चुकी शुरू में यही सोच रही होगी जो अमेरिका थी मतलब की परस्पर मेल जोल...

फिर मै जब इतना कुछ जान कर सडक पर निकला तो देखा की यहा फ्रेंड शिप बैंड भी एक दुसरे को दिया जाता है ...

फिर मैंने लोगो की कलाईयों को निहारने लगा की किसके पास कितना बैंड है....

तो मैंने देखा की जिन लडको की जींस कमर के बिलकुल निचले हिस्से पर टिकी थी, और जिसने अपने बाल और दाढ़ी पर बहुत ज्यादा प्रयोग किया था और जिनका चश्मा काम और नाक के बजाये कहीऔर टिका हुवा था ...

उनके हाथो में फ्रेंड शिप बैंड बहुत देखे गये....

लेकिन जिनलोगो ने अपनी जींस को एकदम उचित स्थानों पर टिका कर उसको बेल्ट से बांध भी लिया था, जिसने अपने बालो और दाढ़ी को उसके मूल स्वरूप में रखा था , और अगर चस्मा था भी तो होने का उचित कारण और टिकाने का वैधानिक स्थान था.

लेकिन ऐसे लोगो के हाथ इस फ्रेंड शिप बैंड से की तंगी से जूझ रहे रहे थे जैसे की आज कल फ्रेंड शिप डे का जन्मदाता अम्रीका जूझ रहा है...

अब सवाल यह उठता है की क्या ऐसे लोगो का सच में कोई मित्र नही होगा..? और होंगे भी तो वो सुचना के किस संसार में जी रहे है की उनको पता नही है की आज मेरे मित्र को फ्रेंडशिप बैंड देना है...

फिर हमको लगा की शायद ऐसे लोग औपचारिकता में यकीन नही करते है...

और हम जानकार और काबिल बनने के चक्कर में इन मोबाईल कंपनियों को केवल एक दिन में करोरो का फायदा पहुचा देते है..

और खुद का गवा देते है...

और फिर कहते है की मंदी आ गयी और फला पार्टी जिम्मेदार है इसकी ....

बल्कि जिम्मेदार हम लोग है इसके क्यों की हम जानते है की अगर भारत की अर्थ व्यवस्था टिकी है तो केवल जमा पूजी के कारण ही...

इन दिवसों के कारण हम न जाने कितना रुपया डालर में बदल कर विदेश भेज देते है ...के ऍफ़ सी और डोमिनो पीज्जा के रस्ते....

अत: हमको विलायती भाषा ही अपनानी चाहिए वनस्पत विलायती खान पान , रहन सहन के.....

अगर हम सच में अमेरिका बनाना चाहते है तो आज अमेरिका का वर्तमान देख लीजिये क्यों अगर हम सच में अमेरिका बनेगे तो निश्चय ही यह हमारा आर्थिक भविष्य होगा.....





Friday, May 6, 2011

चोरो और आतंकवादियो को जनरल नालेज न बनाये

नमस्कार मित्रो...
एक लम्बे अन्तराल के बाद मै आप लोगो के बीच एक बार फिर हाजिर हु..
क्या करे आज कल का माहौल बहुत गर्म है. महिना भी गर्मी का है और semestr परीक्षा भी दिमाग गर्म की हुई है साथ ही साथ इस सेमेस्टर मैंने क्लास कुइच कम की तो गुरु जी का दिमाग भी गर्म है .
अभी इन सब गर्मियों को कम करने में लगा था तभी अमेरिका ने लादेन को मार गिराया और फिर मेरी गर्मी बढ़ गयी..
इस गर्मी का कारण था की अब लादेन तो निपट गया छोड़ गया गया तो अपने कुकृत्य जो अब जनरल नालेज कर रूप में बदल गये है ...
और हमको अभी कई जगह दाखिला लेने के प्रवेश परीक्षा देनी है जिसकी तैया मैंने पूरी कर ली थी लेकी अब ये मारा गया सो इसके बारे में भी पढना पड़ेगा...
सो मेरी दिमाग की गर्मी और बढ़ गयी..
अभी मै इसकी मौत के बाद मै इसके बारे में पढ़ रहा था की ये क्या है? कितना पैसा है इसके पास ? क्या करता है?कैसे करता है?
तो मेरे दिमाग में ये बात आई की इन आतंकवादियो और घपलेबाजो , चोरो को देश से भले न निकला जाये लेकीन जनरल नालेज से जरुर निकल दिया जाये..
हम कल अपना देश चलायेगे कोई टीचर बनेगा, कोई पुलिस बनेगा , कोई अभियंता बनेगा, कोई पत्रकार बनेगा , बनेगा या नही बनेगा इन लादेन और कलमाड़ी जैसे आतंकवादी और चोरो के बारे में क्यों पढ़ेगा..?
चोरो के बारे में जान कर कोई पुलिस कैसे बन सकता है...?
हमारे देश में सब्जेक्ट की कमी है क्या ?
इन सब के बारे में पढ़ते वक़्त कही न कही दिमाग में ऐसी बात जरुर आती है की ये तो बन गया जो इसको बनना था लेकी हमारे देश का शासन कितना कमजोर है की इनलोगों करने देता है जो ये करना चाहते है...और फिर दिमाग गुस्सा आ जाता है अपने देश के शासन के प्रति...
अभी जब लादेन मर था तो उसके बाद अख़बार में निकला था की सउदी अरब की ८०% सदके इसके बाप की कम्पनी ने बनवाई है और इसने सिविल इंजीनियरिंग की पढाई की थी..इत्यादि..
तो जो भी सिविल इंजीनियरिंग लड़का पढ़ा उसको एक अजीब सा गर्व हुआ ..
और जो भी लादेन के बारे में पढ़ा उनमे से अधिकतर लोगो ने यही कहा की जो भी हो इसने अमेरिका को पानी पिला दिया...
ये बाते कही न कही प्रदर्शित करती थी की की लोग न चाहते हुए भी लादेन से प्रभावित है...
लेकिन सत्य यही है की लोग प्रभावित हो जाते है इन लोगो के बारे में जान कर..
सो हमको यही लगता है की अगर हमको एक स्वस्थ्य भारत का निर्माण करना है तो किताबो , मिडिया और जो भी संचार के माध्यम है इन सबको चोरो से दूर रखना होगा...

Tuesday, April 12, 2011

हर गली में एक अन्ना की जरूरत है

इस वक़्त हर जगह केवल अन्ना हजारे को ले कर ही बात हो रही है | और क्यों न हो जब देश की जनता ने अन्ना के मागो का बिना किसी शर्त समर्थन जो किया है | मात्र ९७ घंटे में हमारी सरकार को को लग गया की जनता क्या चाहती है ?
लोगो ने आपने इरादे बता दिए की हमको लोकपाल विधयक चाहिए ही चाहिए |
लेकिन एक बात है की जितने लोगो ने समर्थन किया या उसमे से कुछ लोग ही इस मुद्दे को भली भाती जानते थे की इससे क्या हमको फायदा हो सकता है ? बाकि सब लोग तो मीडिया के कैमरे के फ्रेम के बीचो बीच ही आना चाहते थे...
खैर जो भी ये बात तो माननी पड़ेगी जब इस तरह के लोगो के साथ अन्ना ने सरकार को ९७ घंटे में हिला कर रख दिया लेकिन जब लोग ऐसे मुद्दे को लेकर जागरूक हो जाये तो हमारी सरकार को हिलने में ज्यादा वक़्त नही लगेगा ...
जो भी बिल भी बन गया गया है अब देखना ये है की इसका उपयोग कैसे होता है?
क्यों की अभी जो इसके वजह से हालत बनते हमको दिख रहे है उससे हमको पता चल रहा है की इस लोक पल बिल के जरिये भी बहुत राजनीती होने वाली है | और अभी कई दिनों तक समाचार पत्रों में इसका मुख्य स्थान रहेगा और आम आदमी जो दिन भर दाल रोटी की जुगाड़ में प्रेषण रहता है एक दिन उब कर के इसके बारे में पढना ही छोड़ देगा की इस बिल का क्या हुआ ?
और यह बिल केवल समान्य ज्ञान का एक मुद्दा बन कर रह जायेगा...
मेरे कहने का मतलब यह है की इस मुद्दे पर कम से कम सरकार को राजनीती नही करनी चाहिए क्यों की जो ९७ घंटे हमारी देश की जनता ने अपना योगदान दिया है चाहे वो फोटो खीचने को ही ले कर भले हो ...वो किसी एक पार्टी की जनता नही थी वो थी देश की आम जनता जो की अपना पैसा बचाना चाहती है जो की इन देश के फर्जी कर्णधारो के पास जमा हो जाती है...
मै इस नेताओ की इस राजनीती की गंदी आदत का जिक्र इन बातो से करना मुनासिब समझता हु....
"ये सियासत की तवायफ का दुपट्टा है यारो जो किसी की आंसुओ से तर नही होते... "
और साथ ही साथ देश की जनता जो की अन्ना के साथ अपना भी योगदान दिया को भी एक नसीहत देना चाहूँगा की की केवल इस बिल बर से ही भ्रषटाचार समाप्त नही होगा | क्यों की आम आदमी की मुसीबत ही असली लड़ाई है हम लोगो को थाने में बंद मोटरसाईकिल के टायर चोरी से लेकर टू जी स्पेक्ट्रम तक की आवाज सरकार तक पहुचानी है ...
तब ही जा कर आम लोगो की इस लड़ाई का कोई मतलब निकलकर सामने आएगा ...
हमारे कहने का मतलब ये है की हमको हर गली में एक एक अन्ना तैयार करना होगा जिससे की चोर और चोर पुलिस दोनों को मिला देने पर भी ये आम जनता के एक अन्ना से डरते फिरे और सबको अपना हक अपने हिसाब से मिलता रहे ..

Sunday, March 27, 2011

आज कल के विज्ञापन , विज्ञापन कम और चरित्र प्रमाण पत्र ज्यादा लगते है

नमस्कार मित्रो ...
होली के बाद आप लोगो का मेरे ब्लॉग पर एक बार फिर से स्वागत है ...
मै इस होली में आपने घर गया था और जब मै घर जाता हु तो कोई काम नही होता मेरे पास तो केवल टी वी ही देख कर वक़्त बिताता हु ..
सो मैंने आपने पिछले पोस्ट में टी वी सीरियलों की बात की थी लेकिन जब इस बार मैने ये भी देखा की आज कल बाज़ार भी चाहे वो किसी विज्ञापन की बात हो या फिर फिल्मो की वो यूवाओ की नब्ज को महसूस कर लिया है और फिर इस मार्केट में एक व्यर्थ समझौता को स्थापित कर दिया है...
आप जरा ध्यान दीजिये तो पता चलेगा की किस तरह यूवाओ को समझ कर उनको ये बताया जा रहा है की ये बाजार केवल आपके लिए ही बनाया गया है ....
वैसे आप लोगो ने परफ्यूम के विज्ञापन जरुर देखा होगा की फला परफ्यूम लगाना ने लड़कियां लडको से फेविकोल जैसे चिपक जाएगी, ये टूथपेस्ट करने से लडकियाँ आपको बिल्डिंग के लिफ्ट में भी चुम्बन देगी, आपने एक अंडर वियर का विज्ञापन जरुर देखा होगा की जो लड़का उस अंडर वियर पहनता है उसको बहुत सारी लडकियाँ जंगल में उठा ले जाती है और फिर बाद में जब उस लडके को देखा जाता है तो उसके बदन पर बहुत सारे होठो के चिन्ह पाए जाते है...
हाला की ये विज्ञापन बहुत पुराने है लेकिन मैंने अभी कुछ दिन पहले होली वाले दिन एक मोबाइल का विज्ञापन देखा जिसमे ये दिखाया गया है की एक लड़का जिसके पास एक साधारण मोबाइल होता है फिर वो एक दुकान से कुछ खरीदता है और दुकानदार जो एक लडकी होती है ,के पास पास फुटकर पैसे नही होते है..तो वो दुकानदार लड़की उस साधारण मोबाइल वाले लड़के को फुटकर के बदले चोकलेट देती है..फिर उसी दुकान पर एक दूसरा लड़का आता है और उसके पास लावा का मोबाइल होता है और वो भी कुछ सामान खरीदता है और फिर बात फुटकर पर फस जाती है तो इस लावा मोबाइल वाले लडके को ये दुकानदार लड़की चोकलेट न देकर निरोध देती है...मतलब की लावा मोबाइल वाले लडके ही लडके समझे जाते है ...
फिर मै ये सोचने लगा की लडकियाँ आपसे आकर्षित होंगी ये बता कर विज्ञापन कंपनिया कितना ज्यादा व्यर्थ समझौता करती है ..लेकीन ऐसा कोई विज्ञापन नही आता जिसमे ये दिखाया गया हो की जिस तरह एक साथ बहुत सी लडकियाँ लडको से चिपक जा रही है उसी प्रकार ऐसा कोई सामान का विज्ञापन नही है जिससे की लडके भी उसी अनुपात में चिपक जाये ...
लेकिन फिर हमको लगा की विज्ञापन कंपनिया लडको के चरित्र को समझ कर विज्ञापन बनती है...
तभी तो लडकियों के चरित्र का भी चित्रण एक मोबाइल के विज्ञापन में ही किया गया है ...ये भी नया विज्ञापन है .
माईक्रोमैक्स मोबाइल जिसमे की आपको बहुत सारे कवर मिलेगे जिसका फायदा ये दिखाया गया है की एक लड़की के बहुत ज्यादा ब्वायफ्रैंड है और वो सबसे आपने मोबाइल के कवर को ही बदल कर मिलने जाती है जिससे की वो एक बार पकड़े जाने से बचती है ..
अत: इससे एक बात तो सच है की विज्ञापन कंपनियों ने लडको और लडकियों दोनों की नसों को थाम लिया है की आज के लडके क्या चाहते है और आज कल की लडकियाँ क्या करती है ?
अत:इन विज्ञापनों को देखने के बाद हमको लगा की ये विज्ञापन कम आज कल के युवाओ का चरित्र प्रमाण पत्र ज्यादा लगते है ...?
फिर मैंने सोचा की ऐसे विज्ञापनों पर रोक क्यों लगते की ये सब तो केवल खोखले दावे करते है और होता कुछ नही ...लेकीन फिर मैंने एक दिन बी कॉम की एक किताब पढ़ी जिसमे व्यर्थ समझौता के बारे में लिखा था और बताया था की व्यर्थ समझौता उसे कहते है जैसे कोई मजनू अपनी लैला से कहता है की मै तुम्हारे लिए असमान से तारे तोड़ कर लूँगा और उसे तुम्हारे बालो में सजाऊंगा और लैला इस बात को सुन कर उससे जीवन भर प्यार निभाने का वादा करती है ..लेकिन ये व्यर्थ समझौता है क्यों की इसको न्यायालय द्वारा पूरा नही कराया जा सकता ...
सो ये सब भी शायद व्यर्थ समझौता के अतर्गत ही आते होंगे...
अब चुकी बात मैंने फिल्मो की भी की है तो आज कल एक गाना मार्केट में आया है जो युवाओ को बेफिक्री और उनकी रंगबाजी को दर्शाता है ...जिसमे इसके सारे अवगुणों को बहुत सुंदर तरीके सुरबद्ध किया गया है और ये बताया गया है की आज का यूवा जनता सब कुछ है की लोग उसके कामो से खुश नही है फिर वो सब काम करता है ...
वो गाना है चार बज गये है लेकीन पार्टी अभी बाकि है ...
ये गाना भी किसी चरित्र प्रमाण पत्र से कम नही है ...
जो भी हो अब हमको तो इंतजार उस पल का है जब जीवन बीमा के विज्ञापन में भी ये दिखाया जाये की अगर आप जीवन बीमा कराते है तो इतनी लड़कियां आपके पास हमेशा मडराती रहेगी ..